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आँखें और भी है..

आँखें और भी है..  नरेंद्र हसन काशवी इस आलेख की जड़ में मेरे एक पाठक-छात्र की जिज्ञासा छुपी है । शायद उसका विश्वास भी कि हम सबसे यथार्थवादी तरीके से वही लिख सकते हैं जो जीवन में देखते है। बात सही है। सही है मगर साक्षिप्त भी है और अधूरी भी । शायद इसलिए सिर्फ आंशिक सच है।  मानव अस्तित्व की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम 'देखने' को केवल एक शारीरिक क्रिया मान लेते हैं, जबकि यह मूलतः चेतना का विस्तार है। आँखें केवल माध्यम हैं, असली 'द्रष्टा' हमारे भीतर बैठा वह बोध है जो संवेदना, तर्क और अनुभव की परतों से निर्मित होता है। ‘देखने’ के ‘अंगों’ और ‘उपकरणों’  की यह सूची अंतहीन है—हम जितनी आँखें अपने भीतर पैदा करते हैं, संसार उतना ही गहरा होता जाता है। प्राथमिक दृष्टि तो आँखें ही हैं मगर ये केवल पदार्थ को देखती है। ये देखना सबसे उथला और अविश्वसनीय होता है।   लेकिन जब हम 'दिमाग' से देखना शुरू करते हैं, तो यह किसी आवर्धक लेंस या magnifying glass  जैसा है, जो कई  गुना साफ हो सकता है।  दिमाग का काम है बारीक विवरणों को बड़ा करके देखना। जैसे एक किसी छोटे अक्षर को इतना ...