ज़िक्र और खौफ़
ज़िक्र और खौफ़ नरेन्द्र हसन तुम्हारा ज़िक्र करूँ तो नाराज़ हो जाती है दुनिया, तुम्हारे नाम से क्यूँ ख़ौफ़ खाती है दुनिया। तुम्हारे सदक़े को तड़पती फिरती रहती है, तुम्हारे नाम से क्यूँ थर्राती है दुनिया। वो दर भी तुम्हारा है, वो डर भी तुम्हारा है, जिसे ढूँढते फिरते है, वो घर भी तुम्हारा है। तुम्हारे वजूद में खुद को ख़त्म किए जाते हैं , या अल्लाह ये कैसा भरम है तुम्हारा तुम मुलब्बिस हो अपने ही कारोबार में, तुम मलबूस हो ताक़त के ब्योपार में, तुम अपने आशिकों से क्यों इतना दूर हो, क्या तुम भी बगूले हो दुनिया के ग़ुबार में? तुम ही तुम हो जहाँ जाती है नज़र, तुम ही तुम हो जहाँ दिखता है मंज़र। जैसे मेरा होना कोई मसला ही नहीं , खुद को खुदा समझ बैठे हो इस दरबार में?