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Showing posts from February 22, 2026

ज़िक्र और खौफ़

ज़िक्र और खौफ़ नरेन्द्र हसन   तुम्हारा ज़िक्र करूँ तो नाराज़ हो जाती है दुनिया, तुम्हारे नाम से क्यूँ ख़ौफ़ खाती है दुनिया। तुम्हारे सदक़े को तड़पती फिरती रहती है, तुम्हारे नाम से क्यूँ थर्राती है दुनिया। वो दर भी तुम्हारा है, वो डर भी तुम्हारा है, जिसे ढूँढते  फिरते है, वो घर भी तुम्हारा है। तुम्हारे वजूद में खुद को ख़त्म किए जाते हैं , या अल्लाह ये कैसा भरम है तुम्हारा तुम मुलब्बिस हो अपने ही कारोबार में, तुम मलबूस हो ताक़त के ब्योपार  में, तुम अपने आशिकों से क्यों इतना दूर हो, क्या तुम भी बगूले हो दुनिया के ग़ुबार में? तुम ही तुम हो जहाँ जाती है नज़र, तुम ही तुम हो जहाँ दिखता है मंज़र। जैसे मेरा होना कोई मसला ही नहीं , खुद को खुदा समझ बैठे हो इस दरबार में?

ला-महदूद' (नज़्म )

'ला-महदूद' नरेन्द्र हसन   मैं तुम्हें ज़िंदगी समझूँ तो भी गलत है,  तुम्हारे बिना भी ज़िंदगी ज़िंदगी नहीँ,  मैं तुम्हें फ़लक समझूँ ये भी गलत है,  तुम्हारे बिना फ़लक भी फ़लक नहीं  मैं तुम्हें ज़मीं कहूँ तो ये भी कम है, तुम्हारे बिना ये मिट्टी महकती नहीं। तुम वजह हो मेरे वजूद की ये भी गलत है, तुम्हारे बिना धड़कन भी धड़कन नहीं  तुम्हारे होने से रौशन सा हो जाता हूँ  तुम वो नूर हो जिसकी कोई सरहद नहीं, लोग कहते हैं इश्क़ इबादत है एक  उन्हें मालूम नहीं इश्क़ का खुदा ही नहीं  मैं तुम्हें किनारा कहूँ तो ये भी शिकस्त है मेरे सुकून की तो कोई सरहद ही नहीं  तुम वो ख़ामोशी जो दरिया में मचलती है, तुम्हारा दरिया होना भी गोया दरिया नहीं .

तलाश (नज़्म)

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