ला-महदूद' (नज़्म )
'ला-महदूद'
नरेन्द्र हसन
मैं तुम्हें ज़िंदगी समझूँ तो भी गलत है,
तुम्हारे बिना भी ज़िंदगी ज़िंदगी नहीँ,
मैं तुम्हें फ़लक समझूँ ये भी गलत है,
तुम्हारे बिना फ़लक भी फ़लक नहीं
मैं तुम्हें ज़मीं कहूँ तो ये भी कम है,
तुम्हारे बिना ये मिट्टी महकती नहीं।
तुम वजह हो मेरे वजूद की ये भी गलत है,
तुम्हारे बिना धड़कन भी धड़कन नहीं
तुम्हारे होने से रौशन सा हो जाता हूँ
तुम वो नूर हो जिसकी कोई सरहद नहीं,
लोग कहते हैं इश्क़ इबादत है एक
उन्हें मालूम नहीं इश्क़ का खुदा ही नहीं
मैं तुम्हें किनारा कहूँ तो ये भी शिकस्त है
मेरे सुकून की तो कोई सरहद ही नहीं
तुम वो ख़ामोशी जो दरिया में मचलती है,
तुम्हारा दरिया होना भी गोया दरिया नहीं .
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