अन्ना और लोकतंत्र का मोहपाश
अन्ना और लोकतंत्र का मोहपाश
भारत के लोगों को करिश्माई शख्सियतों की तलाश रहती है . उन्हें अपनी क्षमता,बुद्धि और लक्ष्य को पाने की संभावना पर हमेशा शक रहता है. भगवानो,पैगम्बरों और देवीय शक्तियों वाले इस देश में आम आदमी को कभी किसी लायक ना तो समझा गया ना ही लोकतंत्र के होने मात्र ने इस भ्रम को मिटने में कोई खास भूमिका अदा की है.हम हैश की ‘महान पुरुष,अवतार,महात्मा की बात जोहते रहते है जो हमें अनुप्राणित करे रह दिखाए और हमें ढेल कर मंज्जिल की और ले जाये.जैसे ही ऐसा कोई महात्मा हमें नज़र आता है हम लगभग
किसी 'लोकप्रिय' मुद्दे को उठाने भर से कोई 'लोकप्रियता' को पाने का हक़दार नहीं हो जाता.मुंबई और दिल्ली में लगभग नगण्य 'भीड़' और पर्याप्य प्रचार न मिलाने से निराश अन्ना को अंततः कटु यथार्थ का सामना करना ही था.इससे अन्ना-केंद्रित जनांदोलनो की ये पोल भी खुल गयी कि उनके पीछे का सत्य बड़ा स्वार्थी किस्म का होता है.इस बार अनशन के पीछे बीमारी की कमजोरी से ज़्यादा मानसिक संबल की कमजोरी थी जिसने अपार भीड़ और जन-समर्थन के रूप में उनकी आन्दोलन और अनशन -जिजीविषा को बनाये रखा था.उत्तर -आधुनिक सामाजिक जटिलताओं में आधुनिक किस्म के महावृतान्ति रमणीक 'आधुनिक छलावे' यथा भ्रष्टाचार इत्यादि शायद सभी को बहुत ज़्यादा समय तक 'लुभा' नहीं पाएंगे.
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