अन्ना और लोकतंत्र का मोहपाश
नरेन्द्र कुमार आर्य
भारत के लोगों को करिश्माई शख्सियतों की तलाश रहती है . उन्हें अपनी क्षमता,बुद्धि और लक्ष्य को पाने की संभावना पर हमेशा शक रहता है. भगवानो,पैगम्बरों और देवीय शक्तियों वाले इस देश में आम आदमी को कभी किसी लायक ना तो समझा गया ना ही लोकतंत्र के होने मात्र ने इस भ्रम को मिटने में कोई खास भूमिका अदा की है.हम हैश की ‘महान पुरुष,अवतार,महात्मा की बात जोहते रहते है जो हमें अनुप्राणित करे रह दिखाए और हमें ढेल कर मंज्जिल की और ले जाये.जैसे ही ऐसा कोई महात्मा हमें नज़र आता है हम लगभग
किसी 'लोकप्रिय' मुद्दे को उठाने भर से कोई 'लोकप्रियता' को पाने का हक़दार नहीं हो जाता.मुंबई और दिल्ली में लगभग नगण्य 'भीड़' और पर्याप्य प्रचार न मिलाने से निराश अन्ना को अंततः कटु यथार्थ का सामना करना ही था.इससे अन्ना-केंद्रित जनांदोलनो की ये पोल भी खुल गयी कि उनके पीछे का सत्य बड़ा स्वार्थी किस्म का होता है.इस बार अनशन के पीछे बीमारी की कमजोरी से ज़्यादा मानसिक संबल की कमजोरी थी जिसने अपार भीड़ और जन-समर्थन के रूप में उनकी आन्दोलन और अनशन -जिजीविषा को बनाये रखा था.उत्तर -आधुनिक सामाजिक जटिलताओं में आधुनिक किस्म के महावृतान्ति रमणीक 'आधुनिक छलावे' यथा भ्रष्टाचार इत्यादि शायद सभी को बहुत ज़्यादा समय तक 'लुभा' नहीं पाएंगे.
जब कोई जनांदोलन अचानक मीडिया को मिल जाता है, उसका समय और स्थान तय हो जाता है, और उसके नायक को ‘गांधी 2.0’ का टैग दे दिया जाता है, तो उसके पीछे कोई न कोई तंत्र काम कर रहा होता है। भ्रष्टाचार जैसे सार्वभौमिक, भावनात्मक मुद्दे को इस तरह गढ़ा गया कि वह हर वर्ग को लुभाए, बिना किसी वर्गीय या आर्थिक विश्लेषण के।अन्ना के अनशन की तारीखें, स्थान, मीडिया कवरेज का स्तर, और उनके चारों ओर बनाई गई ‘साधु-समान’ छवि – सब कुछ एक स्क्रिप्ट की तरह लगता है।
यहाँ एक गहरी दुविधा है: क्या लोकतंत्र बिना नायकों के चल सकता है? जनता एक ओर सामूहिक निर्णय-क्षमता पर अविश्वास रखती है, दूसरी ओर किसी एक नेता पर पूर्ण भरोसा करके अपनी एजेंसी सौंप देती है। अन्ना का मामला इस दुविधा का जीता-जागता उदाहरण है। जब वे 2011 में दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर थे, तब लाखों की भीड़ ने उन्हें 'दूसरा गांधी' कहा। लेकिन जैसे ही वे मुंबई या दिल्ली के उन इलाकों में गए जहाँ मीडिया का कैमरा कम पहुँचता था, वैसी ही भीड़ गायब हो गई। इससे दो विपरीत सच सामने आते हैं: पहला, कि 'जनसमर्थन' अक्सर मीडिया-निर्मित दिखावा होता है; दूसरा, कि जनता किसी नेता को तब तक महात्मा बनाए रखती है जब तक वह उनकी 'अपनी' निष्क्रियता को सहज बनाए रखे — बिना उनसे वास्तविक संघर्ष या बलिदान की माँग किए।
क्या अन्ना जैसे आन्दोलन लोकतंत्र को मजबूत करते हैं या कमजोर? एक तरफ, वे सत्ता के गलियारों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-आक्रोश का वैध माध्यम बनते हैं। दूसरी तरफ, वे संस्थागत प्रक्रियाओं (विधायिका, न्यायपालिका, चुनाव) के प्रति अविश्वास को बढ़ावा देते हैं और 'एक व्यक्ति-एक समाधान' का खतरनाक आदर्श स्थापित करते हैं। यदि अन्ना सफल हो जाते — जन लोकपाल बन जाता — तो क्या वह संसदीय लोकतंत्र पर एक 'नैतिक तानाशाही' की स्थापना नहीं होती? और यदि असफल होते, तो जनता का भ्रम और गहरा जाता कि 'बिना महात्मा के कुछ नहीं हो सकता'।
एक अन्य दुविधा स्वयं अन्ना के व्यक्तित्व में है: वे एक साधु-समान सादगी के प्रतीक थे, लेकिन उनके पीछे की टीम (कीर्ति आज़ाद, अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण आदि) राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और रणनीति से भरी थी। क्या आन्दोलन का 'स्वार्थी सत्य' केवल इन समर्थकों का था, या अन्ना स्वयं अपने 'महात्मा-त्व' के मोहपाश में जकड़े हुए थे? उनका बार-बार अनशन करना — जबकि चिकित्सकीय सलाह इसके खिलाफ थी — क्या यह आत्म-बलिदान था या जनतंत्र को ब्लैकमेल करने का एक साधन? यहाँ सवाल उठता है: क्या किसी व्यक्ति का उपवास किसी लोकतांत्रिक सरकार को नीति बदलने के लिए मजबूर कर सकता है? यदि हाँ, तो फिर संसद का क्या अर्थ? यदि नहीं, तो अनशन करने वाले की मृत्यु की जिम्मेदारी किसकी?
अंततः, उत्तर-आधुनिक युग में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे का छलावा इसलिए टिक नहीं पाता क्योंकि लोग जल्दी ही देख लेते हैं कि हर 'महानायक' अंततः सत्ता, पद या प्रसिद्धि का भूखा होता है। जनता के सामने दो ही रास्ते बचते हैं: या तो वह स्वयं अपनी बुद्धि और क्षमता पर विश्वास करना सीखे — जिसके लिए लोकतंत्र के संस्थागत ढाँचे में सक्रिय भागीदारी ज़रूरी है — या फिर वह अनवरत 'महात्माओं' की तलाश में भटकता रहे, हर बार मोहभंग हो, फिर नए की खोज करे। यही 'लोकतंत्र का मोहपाश' है: कि हम मुक्त होने के लिए कोई जंजीर खुद चुन लेते हैं।
नोट: चित्र एआई द्वारा 2026 में निर्मित किया गया है।
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