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हमने बहुत पहले हाथ हिला दिया था -दिमित्री प्सुर्त्सेव

हमने बहुत पहले हाथ हिला दिया था दिमित्री प्सुर्त्सेव  हमने बहुत पहले हाथ हिला दिया था। तो फिर क्यों  जो नहीं हैं यहाँ  फ़िर भी वहाँ से किसे हाथ हिला रहे हैं?.. बुआई का समय  पास आ रहा है और खेत बीजों की प्रतीक्षा में हैं— जैसे हवा घासपात की प्रतीक्षा करती है, लहराती हुई उसे अर्थपूर्ण ढंग से …जैसे जर्जर छतें हमारी प्रतीक्षा करती रहीं। हमने हाथ हिलाये उन दूरियों तक जो धरती के किनारे के पार तक उड़ गए; और हम हम खड़े रहे पकी हवा के बीच जो यहीं जन्मी है और यहीं भटकती रहती है— जब तक शब्द  मेरी उस चिड़िया-सी ज़बान पर जो पुदीने से सुन्न हो गई है, गूंगी हो जाये हैं  और हमारे महान सपने मिल जाते हैं मिट्टी में । अंग्रेज़ी अनुवाद: Philip Metres हिंदी अनुवाद: नरेन्द्र हसन काशवी  Philip Metres के अंग्रेजी अनुवाद का रूसी शब्दों की सहायता और संदर्भ की सहायता से काव्यात्मक अनुवाद। कविता का अनुवाद करने में कई घंटो लगे। वो इसलिए कि अनुवाद में अनवादक भी होता है और उसकी काव्यात्मक समझ भी। साथ ही उसे सिर्फ़ शब्दों को नहीं कवि को भी पकड़ना है और कविता को भी और उस भाषा को भी जि...

अदृश्य

अदृश्य  रिश्तों का रस्सी न होना, अदृश्य होना, होना-सा भी न होना— होता है। दिखने की ज़िद नहीं होते रिश्ते, सिर्फ़ हलफ़नामे करते हैं ऐसा, करारनामे करते हैं— संशय को मुहरबंद करके। वे पढ़ सकते हैं, वे अनपढ़ होते हैं आत्माओं के बोझ का एल्जब्रा। वे पकड़ सकते हैं मुट्ठियों की रेत में महाद्वीपों की दूरियाँ, और टूट जाते हैं अहसासों के एक ग्राम वज़न से… …जुड़ने के लिए कभी आँसुओं से, कभी एक प्यार-भरी नज़र से, या शरीर की आँच से— बिना पिघले। न कोई गिरह, न कोई गाँठ, बस एक अदृश्य आकाश-सा विश्वास। — नरेन्द्र हसन काशवी

जीवित आत्माओं की आदत…………………….

जीवित आत्माओं की आदत ……………………. जो सड़ रहा है, वह क्रांति से नफ़रत करता है जो जीवंत है, वहीं क्रांति संभव है। जो डर रहा है, वह हो शायद व्यवस्था का सबसे साहसी नागरिक पर जो प्रश्न करता है, वही भविष्य की पहली आवाज़ है। जड़ें कभी शोर नहीं करतीं, लेकिन जंगल उन्हीं की भाषा बोलता है। हर ताला लोहे का नहीं होता कुछ हमारे भीतर से जन्म लेते है  सत्ता सबसे पहले शब्दों की रीढ़ तोड़ती है भाषा फिर स्वभावत: अनुपालक हो जाती है । जहाँ असहमति बची हुई है, वहीं मनुष्य अभी जीवित है। इतिहास तारीख़ों से नहीं बदलता, एक अस्वीकार से बदलना शुरू होता है। क्रांति भीड़ का शौक़ नहीं, जीवित आत्माओं की आदत है।

नरेंद्र हसन काशवी की कविताएंसंग्रह का शीर्षक : ज़मीन बोलती है

नरेंद्र हसन काशवी की कविताएं संग्रह का शीर्षक :  ज़मीन बोलती है  अपनी कविताओं के बारे में मैंने ये कविताएँ नहीं लिखीं। ये धुंध से निकलीं जो मेरे और बाकी दुनिया के बीच थी। मैंने सिर्फ सुना। कभी इंजन को सिसकते हुए, कभी ओस को गिरते हुए या कभी किसी मृत हवेली के भीतर दबी हुई चीत्कारों में खुद को खोजते हुए। फिर मैं चुप हो गया। कविताएँ अपने आप बढ़ती रहीं। बे अपनी ही जमीन बोती हुई, उसी जमीन से बोलती हुई, गाहे -बगाहे पैदा होती रहती हैं। सफ़र काफ़ी लंबा है। बचपन में कोई कविता फूटी शायद तब में आठवें दर्जे में पढ़ता था और तब से जब मन करता है आ जाती हैं बेतकल्लुफ़ कभी नींद को जगा कर कभी शाम को अकेले टहलते-टहलते।   मुझे नहीं पता ये कहाँ जा रही हैं। मुझे बस इतना पता है — ये किसी यात्री का निजी सरमाया हैं ।  अब ये आपके सामने हैं बिना किसी उम्मीद के। एक बात और ये खुद से संवाद से पैदा हुई हैं इसलिए कोई प्रत्युतर नहीं हैं। ये कविताएँ किसी को जवाब नहीं देतीं। ये किसी सवाल से नहीं पूछतीं। अगर ऐसा होता तो इनमें से की कविताएं दशकों तक यूं ही अकेले में न सोयी रहतीं।  ये धुंध से निक...

अन्ना और लोकतंत्र का मोहपाश

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नरेन्द्र कुमार आर्य                  भारत के लोगों को करिश्माई शख्सियतों की तलाश रहती है . उन्हें अपनी क्षमता , बुद्धि  और लक्ष्य को पाने की संभावना पर हमेशा शक रहता है. भगवानो , पैगम्बरों और देवीय शक्तियों वाले इस देश में आम आदमी को कभी किसी लायक ना तो समझा गया ना ही लोकतंत्र के होने मात्र ने इस भ्रम को मिटने में कोई खास भूमिका अदा की है.हम हैश की ‘ महान पुरुष , अवतार , महात्मा की बात जोहते रहते है जो हमें अनुप्राणित करे रह दिखाए और हमें ढेल कर मंज्जिल की और ले जाये.जैसे ही ऐसा कोई महात्मा हमें नज़र आता है हम लगभग                   किसी ' लोकप्रिय ' मुद्दे को उठाने भर से कोई ' लोकप्रियता ' को पाने का हक़दार नहीं हो जाता.मुंबई और दिल्ली में लगभग नगण्य ' भीड़ ' और पर्याप्य प्रचार न मिलाने से निराश अन्ना को अंततः कटु यथार्थ का सामना करना ही था.इससे अन्ना-केंद्रित जनांदोलनो की ये पोल भी खुल गयी कि उनके पीछ...

आँखें और भी है..

आँखें और भी है..  नरेंद्र हसन काशवी इस आलेख की जड़ में मेरे एक पाठक-छात्र की जिज्ञासा छुपी है । शायद उसका विश्वास भी कि हम सबसे यथार्थवादी तरीके से वही लिख सकते हैं जो जीवन में देखते है। बात सही है। सही है मगर साक्षिप्त भी है और अधूरी भी । शायद इसलिए सिर्फ आंशिक सच है।  मानव अस्तित्व की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम 'देखने' को केवल एक शारीरिक क्रिया मान लेते हैं, जबकि यह मूलतः चेतना का विस्तार है। आँखें केवल माध्यम हैं, असली 'द्रष्टा' हमारे भीतर बैठा वह बोध है जो संवेदना, तर्क और अनुभव की परतों से निर्मित होता है। ‘देखने’ के ‘अंगों’ और ‘उपकरणों’  की यह सूची अंतहीन है—हम जितनी आँखें अपने भीतर पैदा करते हैं, संसार उतना ही गहरा होता जाता है। प्राथमिक दृष्टि तो आँखें ही हैं मगर ये केवल पदार्थ को देखती है। ये देखना सबसे उथला और अविश्वसनीय होता है।   लेकिन जब हम 'दिमाग' से देखना शुरू करते हैं, तो यह किसी आवर्धक लेंस या magnifying glass  जैसा है, जो कई  गुना साफ हो सकता है।  दिमाग का काम है बारीक विवरणों को बड़ा करके देखना। जैसे एक किसी छोटे अक्षर को इतना ...

ज़िक्र और खौफ़

ज़िक्र और खौफ़ नरेन्द्र हसन   तुम्हारा ज़िक्र करूँ तो नाराज़ हो जाती है दुनिया, तुम्हारे नाम से क्यूँ ख़ौफ़ खाती है दुनिया। तुम्हारे सदक़े को तड़पती फिरती रहती है, तुम्हारे नाम से क्यूँ थर्राती है दुनिया। वो दर भी तुम्हारा है, वो डर भी तुम्हारा है, जिसे ढूँढते  फिरते है, वो घर भी तुम्हारा है। तुम्हारे वजूद में खुद को ख़त्म किए जाते हैं , या अल्लाह ये कैसा भरम है तुम्हारा तुम मुलब्बिस हो अपने ही कारोबार में, तुम मलबूस हो ताक़त के ब्योपार  में, तुम अपने आशिकों से क्यों इतना दूर हो, क्या तुम भी बगूले हो दुनिया के ग़ुबार में? तुम ही तुम हो जहाँ जाती है नज़र, तुम ही तुम हो जहाँ दिखता है मंज़र। जैसे मेरा होना कोई मसला ही नहीं , खुद को खुदा समझ बैठे हो इस दरबार में?