नरेंद्र हसन काशवी की कविताएंसंग्रह का शीर्षक : ज़मीन बोलती है
नरेंद्र हसन काशवी की कविताएं
संग्रह का शीर्षक :
ज़मीन बोलती है
अपनी कविताओं के बारे में
मैंने ये कविताएँ नहीं लिखीं। ये धुंध से निकलीं जो मेरे और बाकी दुनिया के बीच थी। मैंने सिर्फ सुना। कभी इंजन को सिसकते हुए, कभी ओस को गिरते हुए या कभी किसी मृत हवेली के भीतर दबी हुई चीत्कारों में खुद को खोजते हुए।
फिर मैं चुप हो गया। कविताएँ अपने आप बढ़ती रहीं। बे अपनी ही जमीन बोती हुई, उसी जमीन से बोलती हुई, गाहे -बगाहे पैदा होती रहती हैं। सफ़र काफ़ी लंबा है। बचपन में कोई कविता फूटी शायद तब में आठवें दर्जे में पढ़ता था और तब से जब मन करता है आ जाती हैं बेतकल्लुफ़ कभी नींद को जगा कर कभी शाम को अकेले टहलते-टहलते।
मुझे नहीं पता ये कहाँ जा रही हैं। मुझे बस इतना पता है — ये किसी यात्री का निजी सरमाया हैं ।
अब ये आपके सामने हैं बिना किसी उम्मीद के। एक बात और ये खुद से संवाद से पैदा हुई हैं इसलिए कोई प्रत्युतर नहीं हैं। ये कविताएँ किसी को जवाब नहीं देतीं। ये किसी सवाल से नहीं पूछतीं। अगर ऐसा होता तो इनमें से की कविताएं दशकों तक यूं ही अकेले में न सोयी रहतीं।
ये धुंध से निकली हैं। उस धुंध से जो आँखों के बाहर भी थी और भीतर भी। शायद यह सब भी एक ही यात्रा का हिस्सा हैं । इतना अवश्य है अगर आप यहाँ आए हैं, तो एक बार मेरे भीतर प्रवेश करके देखिए शायद हो सकता है आपको अपनी ही झलक मिल जाए या जिन लम्हों की आपको तलाश हो। शायद यह सब भी एक ही यात्रा का हिस्सा है।
बस इतना ही। आत्मवृत
नरेन्द्र हसन काशवी वर्तमान में नरेंद्र कुमार आर्य के नाम से बिहार के एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर है। इनका जन्म तत्कालीन मुरादाबाद जिले के हसनपुर क़स्बे में हुआ। शुरूआती शिक्षा और माहौल रामपुर शहर में हासिल हुआ। साहित्य और भाषाओं में जो रवानगी है यहीं से प्राप्त हुई । फ़िर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान और प्रबंधन में परास्नातक डिग्रियाँ प्राप्त कीं तो राजनीति विज्ञान में पीएचडी कि डिग्री पटना विश्वविद्यालय से मिली। उत्तराखंड के विभिन्न कालेजों में अध्यापन किया। फ़िर भारत सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम में नियुक्ति के दौरान बिहार, झारखंड, बंगाल और छत्तीसगढ़ म महाराष्ट्र के कई शहरों को देखने का मौक़ा मिला।
कुछ लेख और कविताएं हिन्दी और अंग्रेजी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए है, यदा-कदा । मेरी कविताओं की प्राय: पहली पाठक और हिन्दी काव्य-विधा की विलक्षण पाठक और व्याख्याकार प्रो. दीप्ति जी हैं, मेरी पत्नी।
1. सच, झूठ और आम आदमी
सच
अजगर की तरह कुंडलियाँ मारे
पड़ा रहता है कहीं
जबकि
सारे वातावरण में ऑक्सीजन की तरह
कुलांचे मारता फिरता रहता है उसका शत्रु
उसने हम सबके घोड़े लिए हुए हैं उधार
वो हमारी ही पीठ पर बैठा है सवार।
तुमने तो खिड़कियां भी बंद कर रखीं हैं
दरवाज़ों पर तो पहले से ही ताले थे
तुम्हें क्या पता चलेगा
नंगी सड़कों पर जो तुम्हारा जुलूस निकलता है
उसे सिर्फ तुम ही नहीं देख पाते
जबकि तुम्हारा होना एक बाजारू परिघटना होता जा रहा है दिन-ब-दिन
तुम्हारे अस्तित्व का एक-एक अंग अनावृत पड़ा है
और तुम हो कि अभी भी उस अनावृत अस्तित्व में
अपना चेहरा खोज रहे हो
ताकि पहचान सको खुद को ।
सच कहूँ तो सच नदी की तरह रौंदा पड़ा है
और पहाड़ की तरह विक्षिप्त,
सूचनाएं सनसनीखेज मनोहर कहानियों की तरह
तुम्हारी खाली उदास नसों मे दौड़ रही हैं
तुम्हें हर कहानी सच्ची लगती है
तुम्हें लगता है तुम्हारा दिल अभी भी मरा नहीं है
उसमे वेब सीरीज़ों का सारा अस्थि-मज्जा भरा पड़ा है
क्या तुमने कभी सूचनाओं से भरी लाशों का पोस्टमार्टम देखा है
कभी शीशे के सामने जाना और देखना
वहाँ लिजलिजे खून से तर-ब-तर अजगर के चीथड़े मिलेंगे
मुझे मालूम है तुम हिंसा और खून - खराबे से डरने वाले इंसान हो
तुम तो भोजन भी मृत सब्जियों का करते हो
एक आम आदमी जिसकी दुनिया घर-गृहस्थी तक सीमित होती है
ऐसा एक आम आदमी दुनिया का सबसे खतरनाक और क्रूर इंसान होता है
जो अपनी छोटी सी दुनिया से सारी दुनिया को रौंद डालता है
उसकी मासूम-सी ज़रूरतें और निस्पृह इच्छाएँ
सारी पृथ्वी की ऑक्सीजन को लील जाती है
सिर्फ बाकी बचा रहता है घनघोर विषैला धुआँ
हर आततायी की तलवारों और मशीनगन का कवच होता है
एक आम आदमी।
वो अपनी अंतहीन भूख से अक्सर अजगर को पराजित कर देता है
भूख पेट के समीकरण से संचालित नहीं होती लगती
लगता है ये कोई दिमागी फ़ितूर है
जिसमे कोई विशाल दानव बैठा हो
दानवों की अंतहीन प्रतिकृतियाँ हम सबके भीतर
हमारे चर्बीले मस्तिष्क में उदरस्थ।
चाहता हूँ इस कविता को ‘सच, झूठ और आम आदमी’ कहूँ
इसे समाप्त करूँ इस तरह
कि जैसे बाईबल अभी भी समाप्त नहीं हुई है
अभी भी डार्विन के भूत को हर रोज लड़ना पड़ता है ईश्वर से
जैसे मनुस्मृति का जिगर अभी भी किसी यूनानी मिथक की तरह
हर दिन चील के द्वारा नोच लिए जाने के वावजूद जिंदा है
जैसे मोहन जोदड़ो मे दफ़न लाशों की कहानी पढ़ने सकने वाली लिपि अभी भी अपढ़ है
वैसे ही वो अजगर कब तक आम आदमी के लिए कुंडली मारे बैठा रहेगा
या इस प्रश्न के साथ अनवरत रखूँ यह कविता ?
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नरेंद्र हसन/ पटना /08-05.2023
2. वास्तविकताओं की हिचकी
सच्चाई की ठोकरें खाकर भी,
अच्छे दिनों के सुनहरे भ्रम में,
हम खुद को सबसे बेहतर दिखाते हैं,
बिल्कुल वैसे ही,
जैसे नींद थकी हुई आँखों को
भूखी आँखों को बेतहाशा मोहित करती है।
अक्सर खंडित यादों का कोलाज,
बेमतलब की नाजुकता से हो जात है चीथड़ा-चीथड़ा
फ़िर यहाँ-वहाँ खून बहता है
कुचली हुई संवेदनाओं से
जैसे कोई पुराना घाव हर कच्चा हो जाए
अपने घाव होने के एहसास से ।
मेरा शरीर
वह युद्धस्थल है
जहाँ युद्ध लड़े जाते हैं
अक्सर जिनसे मेरा कोई लेना देना नहीं होता
एक अनवरत चलने वाला एक दैवीय संघर्ष
तपस्या तो बस एक खारिज तथ्य है।
अमरता के सार में,
क्षणों का अंतहीन नरसंहार
सजीव प्रसारित किया जाता है,
जैसे हमारी यादों की दीवारों पर लटकने की सजा दी जाती है।
तितलियों के अस्तित्व से धोखा न खाएं,
यह दुःस्वप्नों का युग है, मेरे दोस्तों,
जहाँ राक्षस अब सतह पर नहीं घूमते,
उन्होंने हमारे दिलों पर कब्जा कर लिया है,
स्वयं के प्रति बेवफाई शर्मनाक तरीके से टूटती है,
असंरक्षित, बिना आवरण वाले सपनों में।
3 शेष रह जाती है राख़
जब पिता जाते हैं
सिर्फ वही नहीं जाते।
ले जाते हैं
कोई हिस्सा हमारा भी
कम रह जाता है आदमी
आदमी होकर भी।
जब पिता नहीं होते
तो पत्ते का कह नहीं पाते
वे कहानियां
जो उन्होंने विशाल पेड़ के गोद में
सुनी थी कभी।
वे ले जाते हैं अपने साथ
घड़ी की सुइयां
जो दौड़ती रही थीं
हमारे साथ जब तक थे वे।
फ़िर दीवार पर
छाप बची रह जाती है
समय से संघर्ष करती हुई।
जब पिता जाते हैं
तो वह ले जाते हैं
चिता की चिंगारियां के साथ
स्मृतियों का शरीर
पीछे छूट जाती है
खोखलेपन की राख़
फिर वह भी रवाना हो जाती है
नदी के साथ।
आग नहीं जलाती एक देह
जला देती है
उन सारी कही-अनकही कहानियों के शरीर
जो हमने साथ-साथ सुनी, कही और अनकही थीं
जो अब कभी सुनाई नहीं देंगी।
-----*….
मोतिहारी 2026
5. कोरे खत
............
कोरे खत रह गए हैं बस
स्याही लापता है
लफ्ज़ गिरफ्तार हो गए हैं याके
गोया खत भी कहां हैं
कागज़ के सफहे हैं बस
लम्हा लम्हा कर अर्से
जा चुके है।
वो स्याही चुक गई है
जो याद रहती थी
वो कालिख
जो जज़्बात रोशन करती थी
हल्के हल्के चिराग़
अपनी हो रोशनी पी रहा हो
उजाला चिराग़ तले
जमा हो रहा हो
रोशनी के निशानात रह गए हैं
लिफ़ाफे ट्रेन के डिब्बों से हैं
इतनी दफा इंजन बदले हैं
पते सारे रेल की पटरियां हो गए है
वक्त पटरियों की वो खाली जगह है
जो दोनों के नज़दीक आने के मुगालते में कब से खड़ी हैं
कोरे खत रह गए है
जो जगहों ने बुतों के नाम लिखे हैं
ना कोई इबारत है
ना कोई सूरत है
ना किसी साए के निशान हैं
खाली जगहों पर
मेज़ पर सिफ़र की तरह पड़े हैं।
.........*.......
नरेन्द्र हसन
15.1.2022/पटना।
१. भूख
अभी भी भूख ज़िंदा है मौत की वेशभूषा में
लोग मर रहे हैं भूख से
और एक बड़ा तबका बदहजमी की बीमारियों से
सत्ता की दूधिया सफ़ेद कमीजों पर
काई की तरह पसर जाती है
जब भी भूख मौत के संग मिलकर
कोई खेल खेलती है
देश के चमकते चेहरों पर
जो उग आती है काई की तरह
हिकारत की आयतें बनकर
धर्मभीरू देश के चिकने चेहरे पर।
6. भूख
मौत का गीत बनकर
अखबारों की सुर्खियां बनकर
बेशर्म कहीं की !
बड़े शर्मीलें हैं हम
भूख तू बड़ी अश्लील है
खोल देती है हमारा नंगापन.
तू संस्कारों का पर्दा अनावृत कर,
तू चीखती है चौराहों पर
और हम बंद कमरों में सभ्यता का दम भरते हैं।
तेरी बेशर्मी दरअसल हमारा आईना है,
जिसे देखने से हम डरते हैं।
अभी भी मौत में जज्बा है
गुरबत की गन्दी तस्वीरों को निगलने का।
7. राजनीति की भाषा
जिसे व्यक्त न किया जा सके
वो संवाद हूँ मैं
राजनीति की गंदी भाषा में
आतंकवाद हूँ मैं।
मैं यूँ तो घर की सरहदों से पार एक ज़ाती मामला हूँ
मगर रहता हूँ प्राय कैमरों में कैद
चैनलों पर धुआंधार प्रसारित होता हुआ
किसी उपयुक्त नाम की उहापोह में
अक्सर रह जाता हूँ बनकर एक अपरिभाषित व्यंजना
खुद से कतराते हुए फ़िर
तुम मुझे 'जातिवाद' की दराज़ में डाल देते हो।
सिर के भीतर ज़मीन नहीं होती
जमीन भी कोई फैक्ट्री नहीं होती
मिट्टी से बन्दूकें नहीं उगती और ना राख कि क्यारियों में बारूद पनता है
अव्यवस्था और अन्याय के आहिस्ता-आहिस्ता सहवास से उपजा
आक्रोश है—जो तुम्हारी लम्पट शब्दावली में,
सुविधानुसार अनुसार 'नक्सलवाद' कहलाया जाता है
हर शीशे में अलग ही चेहरा है
पुती हुई हर चेहरे पर अलग ही थोपन
जब भी मैं अपनी हकीकत के साथ खड़ा होता हूँ,
राजनीति मेरे अर्थ बदल देती है
भाषा के इस क्रूर खेल में,
हर बार मेरा 'स्व'—एक परिभाषा बनकर खो जाता है।
8. हवा भी कटती है
हवा भी कटती है
तो आवाज करती है
कुछ इंसान
जब गिरते हैं कट कर
तो हवा हो जाते हैं
उनके होने के साक्ष्य भी मिट जाते हैं।
कीचड़ जब दबती है पैरों के नीचे
तो जवाब देती है पलट कर अपनी ही भाषा में आसपास की चीजों पर छोड़ जाती है।
अपने होने के निशान
कुछ इंसान जब मरते हैं दबकर
उफ्फ तक नहीं करते
आवाज भी उनकी गूंजती है गूंगी होकर।
पेड़ भी गिरता है जब तो हिला देता है जमीन प्रतिकार करता हुआ
घोसलों के नरसंहार का
मगर कुछ इंसान जब गिरते हैं तो
देह गिरने की भी कोई आवाज नहीं आती
ना धरती हिलती है न शोर होता है
ना कोई न्याय की ललकार उठती है
सवाल भी खड़े नहीं होते
मौन दफन हो जाते हैं
जब इंसान गिरते हैं
तो इंसानियत साथ ले जाते हैं।
9. डर
डर
जब सच होना होता है,
हो जाता हैं
उसे नहीं लगता डर
हमारे डर से।
हमारे सबसे भयभीत करने वाले
कभी कभी यूं ही उभर आने वाले
छोटे बड़े डर
घर बनाकर जीते हैं हमारे भीतर।
वे हमारी साँसों की गिनती रखते हैं
वे रखते हैं हिसाब हमारी हर मुस्कुराहट का
एक बारीक-सी दरार ढूँढ लेते हैं,
हमारे जीवन में
ताकि रिस सके वह बूंद बूंद
कभी नींद में दुस्वप्न बनकर
कभी दिन के घनघोर उजाले में कौंध बनकर
जिसे हम कोई दूसरा नाम न मिलने पर
कहते हैं डर।
डर एक बीज की तरह
पैदा होता है हमारे वजूद के साथ
मन के ऊसर का एक परजीवी
डर मन के घोंसले पर मंडराता गिद्ध है
उम्र के साथ मज़बूत होता हुआ
डर अंतहीन जीने की इच्छा की वासना है
लगभग अपराजेय ख़ुद से ही लड़ते हुए।
10. लोकतंत्र
मैं ही लोकतंत्र हूँ
मैं ही हूँ लोकतंत्र का मुद्रा
कुछ लोग मुझे जनमत कह कर पुकारते हैं
कुछ लोग जनराशि
जब आप मुझे नफरत भरी नज़र से देखते हैं
मैं जातियों और वर्गों में विभक्त नज़र आता हूँ ।
मेरा टुकड़े -टुकड़े होना लोकतंत्र में बड़े काम की चीज़ है
मुझे भीड़ में आसानी से बदलने का ना जाने
इसके पास कौन सा मन्त्र है
अछूत और भी अछूत. मुसलमान और भी मुसलमान,
और हिन्दू और हिन्दू बनता जाता है
जबतक कि वो दंगों में कट कर ना मर जाए
उसके के रक्त के रंग से उसकी पहचान न हो पाए
इस मन्त्र के आवाहन से लोकतंत्र कुछ इसी तरह मुखर होता जाता है।
मैं इसके सकल विकास का मूर्त स्वरूप हूँ
मैं ही भूख से मरता हूँ
मरने के पहले कई दफ़ा कई बार मरने के बाद
नारों में बदलता हूँ
नए-नए मुहावरों की शक़्ल में
लोकतंत्र के चिरयौवन के लिए मेरा ही करना पड़ता है बलिदान।
मुझ पर ही बंदूकें चलायी जाती हैं
मेरे ही शरीर के लहू से राष्ट्रवाद की फ़सलें उगायी जाती हैं
निकाली जाती हैं विशाल रैलियां
मेरी ही गुमनाम लाशों पर
जब जब संविधान छलनी होता है
मैं क़ानून की सलीबों पर लटका मिलता हूँ;
ज़िंदा जल जाता हूँ झोंपड़ियों की लपटों के साथ
विदीर्ण योनियों में सामंतवाद का गँदला वीर्य लिए
बार बार लोकतंत्र के मायनों के साथ
बलत्कृत किये जाने के लिए मैं ही लोकतंत्र हूँ ।
11. कोहरा
अँधेरे की विशाल बिल्ली
पंजों में दबाये घूम रही है
तपेदिक से मृत सुबह के शव को मुहँ में लिए
रक्तहीन जीवनविहीन
एक घना कोहरा भी
इस षड्यंत्र में शामिल है बिल्ली के संग।
अलाव की कोमल आग धुंध को निहार रही है
मिमियाते मायनों से भरी
ओस की बूंदों से भरी सुबह
सुबह हुई तो है, मगर आई नहीं,
कफ़न ओढ़कर शहर अब भी सोया हुआ है
हमारी चेतना पर भी कोई पाला पड़ा है,
इस घने कोहरे में वो भी रास्ता भटक गया है कहीं ।
20.1.16/ पटना
12. मैंने तैरना नहीं सीखा
जब हर कोई समुन्द्रों को लांघ डालने की धुन में था
जब हर कोई नदी को छान रहा था
सब ने कहा ये बड़ा आसान है
आकाश की ओर देखते हुए पानी में लेट जाइए
या फिर समझिये आप नींद में पेले के साथ फुलबॉल के मैदान में दौड़ रहें हैं अन्धाधुंध
बस अपने सिर को डूबने से बचाये रखना
यही शरीर का सबसे भारी अंग है
मुझे लगा यही सबसे भारी काम है
शरीर मुर्दा हो तो खुद ब खुद तैरने लगता है
इसमें सीखने की क्या बात है
मुश्किल तो यही है हम अपने सिर को डूबने से बचा पाएं
मैंने ऐसे भी देखा ग़ोताखोर उदबिलाब
मछलियों का शिकार करके फिर किनारे पर ही आ जाते थे।
13. कौतूहल की हवाई सवारी
शहर में जब पहली बार आई था
बिजली का टुकटुक
काफ़ी कौतूहल भरा था ये सारे शहर के लिए
चालक की बगल पर बैठा आदमी अचानक
लड़खड़ाती जिज्ञासा से भर जाता था
सवाल करता जाता था जिनका कोई 'किराया' नहीं लगता
क्योंकि जिज्ञासा से भरा आदमी बड़ा दुनियादार होता है
वो दूरी को भाड़े से नापता है
चालक के मन में उतरता चला जाता है
सवालों के बहाने ।
एक उबा हुआ आदमी स्वयं के जीवन को तलाशता है
दूसरे के भीतर स्वयं में उठते सवाल उठाकर
उन जवाबों से बचता हुआ
जो संभवत: पहले ही कहीं भीतर मर चुके हैं
वह शब्दों के मायावी जाल बुनता है
बैटरी, चार्ज और मुनाफे के इर्दगिर्द कौतूहल बिछाकर
ताकि उन सवालों का सामना न करना पड़े
जो उसके अपने भीतर कब के मर चुके हैं।
कुछ देर में वह उतर जाएगा
पत्थर की मस्जिद के पास
चाय की प्याली से उठती भाप के बीच,
वो देर तक देखेगा कितने ही अनगिनत बिजली के रिक्शों को
जो गलियों के अंधेरों में ओझल हो रहे हैं,
बिल्कुल उसकी अपनी अधूरी इच्छाओं की तरह।
पटना/ 2017
14. उत्प्रेक्षा अलंकार
तुम थक गए हो
तुम सो जाओ
कोई कहता है जब मैं कहना चाहता हूँ
मैं क्यों संदिग्ध अभिव्यक्तियों के युग में
हो गया हूँ स्पष्टता सा व्यर्थ
सामाजिक महाकाव्य में
किसी अस्पृश्य सा सन्दर्भ
दर असल
मैं जब भी कुछ कहना चाहता हूँ नैसर्गिक
वह तुम्हारे अभिवचन की सामग्री बन जाती है
और व्यथाओं को दिए मासूम शब्द
तुम्हारे लिए बन जाते हैं मेरी आत्म-घोषणा के प्रपत्र।
तुम शब्दों की मायावी दुनिया के प्रौढ़ बाज़ीगर हो
जो मेरे हर कहे को अपने पक्ष की दलील बना डालते हो
हकीक़त ये है कि
तुम्हारी सोच के नाबदान से होते ही
सरल रेखाओं में उभरे ख़म
अश्लील सी आकृति बन जाते हैं।
तुम्हारा होना ऐसा ही है
जैसे पहाड़ पर फिर बादल फटा हो
आदिवासियों के जंगलों में आदमखोर घुस आये हों
एक बच्ची किस खौफनाक चहरे को देखती हो क्रूर ढंग से हँसते हुए
बस्ती में एक नया मठ उग आया हो उपासना के शिकारियों का।
ये सचेत होने का समय है
ये खुद के होने का समय है।
15 . रात आठ बजते-बजते
रात आठ बजते-बजते
इस छोटे से पहाड़ी शहर का छोटा बाज़ार
ऊँघने लगता है, मई के महीने में भी
दिन भर हाफंती-दौड़ती आवारागर्द जीपें
बस अड्डे के किनारे अब चुपचाप खड़ी हैं,
जैसे थकी हुई पहाड़ी सड़कों का बोझ उतार रही हों।
रैन बसेरा गेस्ट हाउस के नीचे
रात भर बहती है मंदाकिनी,
जैसे अभी भी नीचे के शहरों में
कुछ ज़रूरी संदेश पहुँचाना बाकी हो।
वाहन अभी भी कुछ अनमिटी प्यास बाक़ी हो
सजवाण ढाबे का तंदूर अब ठंडा हो चला है दिनभर आग से खेलते-खेलते
न अब कोई ड्राइवर आना है शायद, न कोई मुसाफ़िर
आधी रात को चट्टानी चुप्पी के बीच
पिसती है रहती क़स्बे की खामोशी गुनसोला मसाला चक्की में देर तक
कमरे में अकेलापन
कमरे की खाली पड़ी कुर्सियों पर
किसी अदृश्य इंसान की तरह पसर पड़ा है
खूंटी पर टंगी कमीज़ किसी व्यथित मनोदशा की परछाई-सी
पिछले कई महीनों से लटकी प्रतीत होती है
और मेरे कमरे में पसरा थके हुए बल्ब का पीलापन
इस सन्नाटे को और गहरा करता रहता है।
हर रोज़ की तरह अगली सुबह खूब आपाधापी होती है
मगर मंदाकिनी फिर पिछड़ जाती है
राजमार्ग 107 पर दौड़ती उन गाड़ियों के शोर से।
अगस्त्यमुनी/ 2005
16. शहद
तुम जब भी बोलते हो,
अपने मुँह में इतना शहद घोल लेते हो
कि तुम्हारी बातें—बातें नहीं रहतीं,
मधुमक्खियाँ बन जाती हैं
जब भी तुम ऐसा करते हो
मैं अपने चेहरे पर एक मोटा कंबल ओढ़ लेता हूँ
न अब तुम्हारी कोई शक्ल दिखती है,
न शब्दों का कोई अर्थ बचता है।
अब सिर्फ एक बेसुरी भनभन बचती है।
17. खबर बेचने वाला बचपन
उन मासूम नींदों का
हर रात कत्ल होता है, और हर रोज़ अपहरण;
पर यह बर्बरता—
किसी अखबार का समाचार नहीं बनती
जो अखबार बिक रहे हैं,
वे उन्हीं के बचपन की लाशों पर छपे हैं
रेलवे प्लेटफॉर्म पर रोज़
अधमुंदी, अधजगी और डरी हुई आँखों से
एक ही वाक्य निकलता है—
"बाबू जी! आज की ताज़ा खबर... सिर्फ दो रुपये!"
केसरी, उजाला हो या हिन्दुस्तान,
सब बिकते हैं बस दो रुपयों में;
और उन्हीं दो रुपयों के पीछे
कहीं छुप जाती है वह मासूम चीख़,
सुबह के कोहरे में स्टेशन की पटरियों के बीच
सवाल करती
क्या तुम्हारे अखबारों की दुनिया मेरे नन्हे हाथों की भूख से बहुत छोटी है।
मुग़लसराय/2011
18. चमगादड़
चमगादड़ हैं हम,
जो सच के तीखे उजाले से खौफ खाते हैं।
हम अपनी ही आँखों पर पट्टी बाँधकर,
झूठ की डाल पर उलटे लटके जाते हैं,
सीधी दुनिया सचमुच एक भयावह जगह है
जब वक्त अंधेरे की चादर ओढ़ लेता है,
तो हम सुरक्षित होने का स्वाँग रचते हैं,
मगर भीतर— भयांक्रांत नन्हे बच्चे सी
सूख जाती हैं हमारी साँसें
चीख पड़ने को मन करता है
हम अंधेरे में हैं, पर अंधेरे से डरते भी हैं।
उजाला! उजाला!
ये शायद सूरज की रोशनी नहीं अपनी ही परछाइयों के नंगेपन वस्त्र है
जो उल्टा लटकने से मुहँ पर पड़ जाता है।
19. पहाड़ी सौंदर्य
पहाड़ सिर्फ़ सौंदर्य नहीं हैं,
सुना है—ये ज्वालामुखी के ठंडे होने से बने हैं;
शायद इसीलिए इनके भीतर
पत्थर की एक स्थायी बर्फ़ जमी है।
शाम होते ही वीरानी इन्हें निगल लेती है
और पहाड़ एक गहरे, सियाह शोक में डूब जाते हैं
सुबह पहाड़ी नदियों का पारदर्शी पानी
बेहद खूनी नज़र आता हैं,
जैसे रात के सन्नाटे में
चट्टानों से टकराकर कोई 'अछूत' लहूलुहान हुआ हो
और पानी के तीखे शोर में
उसकी चीखें कहीं पत्थरों के बीच खो गई हों
आज के अखबार की सुर्खी है
"पहाड़ों में जातिवाद और अपराध घटा"
भीतर के पन्ने पर दर्ज़ है
"एक ब्राहमण ने दलित की हत्या कर दी थी क्योंकि उसने उसके अनाज को छू लिया था."
20. प्रेम के शब्दकोश में शून्य
जब तुम
सबसे ज़्यादा बात करना चाहती हो
तुम ख़ामोश हो जाती हो
निःशब्द हो जाते हैं
तुम्हारे होंठ
आँखों में रात का रेगिस्तान होता है
ह्रदय
द्वन्द से जूझता एक निर्वात
संभवत
आवेग का कोई गुरुत्वाकर्षण
जुबान को तुम्हारी
तालु से चिपका लेता है
वो शब्दावली
जो तुम बचपन से सीखती
आयी हो
तुम्हें धोखेबाज़ लगने लगती हैं
तुम शून्य के शब्दकोष में
ढूंढने लगती हो
अपने मूक होने का अर्थ.
21. तकनीक के घोड़े
तकनीक के घोड़ों ने छलाँगें लगाने का हुनर
बेहद तेज़ी से सीखा
और उस रफ़्तार में— तितलियाँ चुपचाप गुम होने लगीं.
राकेट आसमान की तरफ जाता है बहुत ऊपर
पर उसमें वह हुनर कहाँ—
जो एक झाड़ी से उड़कर दूसरी में छुप जाए
वह इठलाना, वह फुर्र हो जाना—
अब एक नीरस रैखिक चाल में बदल गया है।
वह आकाश की ओर सिर उठाए सिर्फ
आग और धुएँ का ग़ुबार छोड़ता है,
अपने पेंदे से— सुरररररररर्र!
बच्चे अब बंदूक़ों और राकेटों से
खेलना पसंद करने लगे हैं
बंदूकें निशाना लगाना सिखाती हैं
ये शरू होता है घर से ही
पहले दादाजी पर, फिर पापा पर या रसोई में उलझी मम्मी पर
कोई भी न मिलने पर
अभी अभी चलना सीखी छोटी बहन पर ।
फिर पिस्तौल स्कूलों की तफरीह पर भी निकल पड़ती है
पिस्तौल में पंख नहीं होते
तकनीक होती मनुष्य को मारने की
बात-बेबात चल पड़ती है किसी साथी या शिक्षक पर
हम देख नहीं पा रहे है
धीरे-धीरे मासूम हाथों का निशाना पैना होता जा रहा है।
22. दौड़
मैं अगर
अकेला दौड़ता
तो
समय को पटक सकता था
घड़ी के अखाड़े में।
मगर मेरे पीछे
मुझसे ही
एक इतिहास बँधा था —
पैरों में उलझता,
घिसटता हुआ।
जिसकी रस्सियाँ
इस देश के हर कोने में
कीलों के एक अदृश्य जाल से
बँधी थीं।
हर चौराहे से उठता
वेदनापूर्ण स्वर
मुझे पीछे खींच लेता था।
मैं अकेला दौड़ता
तो प्रतिस्पर्धियों को
नाकों चने चबबा सकता था।
पर मैं वस्तुतः
समय के खिलाफ दौड़ रहा था।
मील के हर पत्थर पर
षड्यंत्रकारी
मंदिरों के देवता बनकर
मेरी पराजय का आवाहन कर रहे थे।
मैं केवल अकेला दौड़ता
तो दौड़ जीत सकता था,
पर मेरे कंधों पर हमेशा
कोई जुआ चढ़ा था
सहस्रों अदृश्य इतिहास के खेत-सिवान
मुझे सींचने पड़ते थे
अपने पसीने से —
शताब्दियों से सूखे होंठों पर प्रश्नचिन्ह
अक्सर मेरी गति के आगे
दीवार बनकर खड़े हो जाते थे
वे प्रश्न— जो मेरी दौड़ के 'मर्म' को ही संदिग्ध कर देते थे।
23. कविता की रात
तुम रात को ही क्यों आती हो
बेबक्त -जगाती हो
पलकों के उनींदा हो जाने तक
रात का बेखौफ ज़िक्र करना तुम्हे मालूम नहीं
इस फ़ासीवादी दुनिया में इसके क्या मायने हैं ?
तुम्हें मालूम तो है
सुबह हमारे जैसे लोगों के कहने पर नहीं चलती
आ धमकती है
टूटी किवाड़ों की किरीच से, खिड़की के दरके हुए शीशों से, या दरवाज़े के नीचे से चुपचाप सरक कर— 'अखबार सी'
उसे क्या क्या मतलब कविता आँखों से कब गई ?
संवेदना को सुलाते-सुलाते
कितना समय लगा
यह सुबह कभी नहीं पूछेगी
सुबह
वो तो बस सस्ती आपाधापी में रहती है
सनसनीखेज सुर्खी बन दुनियादारी के मुखपृष्ठ पर छप जाने को।
मई 2009/धनबाद
24. क़द
तुम अब मानो या न मानो—
मेरा फैलता यह क़द,
तुम्हारी ही साँसों के रास्ते तुम्हारी छाती तक पहुँच चुका है
अब यह और बड़ा होगा— इतना
कि तुम्हारी नफरत के लिए जगह कम पड़ जाएगी
बेहतर है कि मेरे अस्तित्व को अस्तित्व ही महसूस करो,
वरना तुम्हारी यह सामाजिक कुंठा—
जो एक ओछे विचार से शुरू हुई थी,
अब एक सामूहिक सिज़ोफ्रेनिया में बदल जाएगी
जहाँ तुम अपनी ही गढ़ी हुई कल्पित दुनिया में
खुद से ही हारने लगोगे।
क्योंकि मैं अब महज़ एक सपना या विचार नहीं,
एक पत्थर जैसा सच हूँ,
जिसे तुम चाहकर भी अपनी नज़रों से ओझल नहीं कर सकते
तुम अब मानो... या न मानो।
25. मगज़ का मायोपिया
मैंने देखा है पुतलियों पर उगते बारीक मोतियाबिंद को,
जब कुंठाओं की एक मटमैली झिल्ली जम जाती है सोच पर
और देखते ही देखते, पूरे किसी के संसार पर काबिज हो जाती है
फिर आदमी सिर्फ भ्रम जीता है,
उसके अपने हिस्से का सूरज भी उसके मगज़ को भेद नहीं पाता
जब
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