जीवित आत्माओं की आदत…………………….
जीवित आत्माओं की आदत
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जो सड़ रहा है, वह क्रांति से नफ़रत करता है
जो जीवंत है, वहीं क्रांति संभव है।
जो डर रहा है, वह हो शायद व्यवस्था का सबसे साहसी नागरिक
पर जो प्रश्न करता है, वही भविष्य की पहली आवाज़ है।
जड़ें कभी शोर नहीं करतीं,
लेकिन जंगल उन्हीं की भाषा बोलता है।
हर ताला लोहे का नहीं होता
कुछ हमारे भीतर से जन्म लेते है
सत्ता सबसे पहले शब्दों की रीढ़ तोड़ती है
भाषा फिर स्वभावत: अनुपालक हो जाती है ।
जहाँ असहमति बची हुई है,
वहीं मनुष्य अभी जीवित है।
इतिहास तारीख़ों से नहीं बदलता,
एक अस्वीकार से बदलना शुरू होता है।
क्रांति भीड़ का शौक़ नहीं,
जीवित आत्माओं की आदत है।
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