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Showing posts from May 24, 2026

अन्ना और लोकतंत्र का मोहपाश

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नरेन्द्र कुमार आर्य                  भारत के लोगों को करिश्माई शख्सियतों की तलाश रहती है . उन्हें अपनी क्षमता , बुद्धि  और लक्ष्य को पाने की संभावना पर हमेशा शक रहता है. भगवानो , पैगम्बरों और देवीय शक्तियों वाले इस देश में आम आदमी को कभी किसी लायक ना तो समझा गया ना ही लोकतंत्र के होने मात्र ने इस भ्रम को मिटने में कोई खास भूमिका अदा की है.हम हैश की ‘ महान पुरुष , अवतार , महात्मा की बात जोहते रहते है जो हमें अनुप्राणित करे रह दिखाए और हमें ढेल कर मंज्जिल की और ले जाये.जैसे ही ऐसा कोई महात्मा हमें नज़र आता है हम लगभग                   किसी ' लोकप्रिय ' मुद्दे को उठाने भर से कोई ' लोकप्रियता ' को पाने का हक़दार नहीं हो जाता.मुंबई और दिल्ली में लगभग नगण्य ' भीड़ ' और पर्याप्य प्रचार न मिलाने से निराश अन्ना को अंततः कटु यथार्थ का सामना करना ही था.इससे अन्ना-केंद्रित जनांदोलनो की ये पोल भी खुल गयी कि उनके पीछ...

आँखें और भी है..

आँखें और भी है..  नरेंद्र हसन काशवी इस आलेख की जड़ में मेरे एक पाठक-छात्र की जिज्ञासा छुपी है । शायद उसका विश्वास भी कि हम सबसे यथार्थवादी तरीके से वही लिख सकते हैं जो जीवन में देखते है। बात सही है। सही है मगर साक्षिप्त भी है और अधूरी भी । शायद इसलिए सिर्फ आंशिक सच है।  मानव अस्तित्व की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम 'देखने' को केवल एक शारीरिक क्रिया मान लेते हैं, जबकि यह मूलतः चेतना का विस्तार है। आँखें केवल माध्यम हैं, असली 'द्रष्टा' हमारे भीतर बैठा वह बोध है जो संवेदना, तर्क और अनुभव की परतों से निर्मित होता है। ‘देखने’ के ‘अंगों’ और ‘उपकरणों’  की यह सूची अंतहीन है—हम जितनी आँखें अपने भीतर पैदा करते हैं, संसार उतना ही गहरा होता जाता है। प्राथमिक दृष्टि तो आँखें ही हैं मगर ये केवल पदार्थ को देखती है। ये देखना सबसे उथला और अविश्वसनीय होता है।   लेकिन जब हम 'दिमाग' से देखना शुरू करते हैं, तो यह किसी आवर्धक लेंस या magnifying glass  जैसा है, जो कई  गुना साफ हो सकता है।  दिमाग का काम है बारीक विवरणों को बड़ा करके देखना। जैसे एक किसी छोटे अक्षर को इतना ...