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Showing posts from July 5, 2026

जीवित आत्माओं की आदत…………………….

जीवित आत्माओं की आदत ……………………. जो सड़ रहा है, वह क्रांति से नफ़रत करता है जो जीवंत है, वहीं क्रांति संभव है। जो डर रहा है, वह हो शायद व्यवस्था का सबसे साहसी नागरिक पर जो प्रश्न करता है, वही भविष्य की पहली आवाज़ है। जड़ें कभी शोर नहीं करतीं, लेकिन जंगल उन्हीं की भाषा बोलता है। हर ताला लोहे का नहीं होता कुछ हमारे भीतर से जन्म लेते है  सत्ता सबसे पहले शब्दों की रीढ़ तोड़ती है भाषा फिर स्वभावत: अनुपालक हो जाती है । जहाँ असहमति बची हुई है, वहीं मनुष्य अभी जीवित है। इतिहास तारीख़ों से नहीं बदलता, एक अस्वीकार से बदलना शुरू होता है। क्रांति भीड़ का शौक़ नहीं, जीवित आत्माओं की आदत है।

नरेंद्र हसन काशवी की कविताएंसंग्रह का शीर्षक : ज़मीन बोलती है

नरेंद्र हसन काशवी की कविताएं संग्रह का शीर्षक :  ज़मीन बोलती है  अपनी कविताओं के बारे में मैंने ये कविताएँ नहीं लिखीं। ये धुंध से निकलीं जो मेरे और बाकी दुनिया के बीच थी। मैंने सिर्फ सुना। कभी इंजन को सिसकते हुए, कभी ओस को गिरते हुए या कभी किसी मृत हवेली के भीतर दबी हुई चीत्कारों में खुद को खोजते हुए। फिर मैं चुप हो गया। कविताएँ अपने आप बढ़ती रहीं। बे अपनी ही जमीन बोती हुई, उसी जमीन से बोलती हुई, गाहे -बगाहे पैदा होती रहती हैं। सफ़र काफ़ी लंबा है। बचपन में कोई कविता फूटी शायद तब में आठवें दर्जे में पढ़ता था और तब से जब मन करता है आ जाती हैं बेतकल्लुफ़ कभी नींद को जगा कर कभी शाम को अकेले टहलते-टहलते।   मुझे नहीं पता ये कहाँ जा रही हैं। मुझे बस इतना पता है — ये किसी यात्री का निजी सरमाया हैं ।  अब ये आपके सामने हैं बिना किसी उम्मीद के। एक बात और ये खुद से संवाद से पैदा हुई हैं इसलिए कोई प्रत्युतर नहीं हैं। ये कविताएँ किसी को जवाब नहीं देतीं। ये किसी सवाल से नहीं पूछतीं। अगर ऐसा होता तो इनमें से की कविताएं दशकों तक यूं ही अकेले में न सोयी रहतीं।  ये धुंध से निक...