संसाधनों का सामुदायिक अधिकार बनाम राज्य की निरंकुश विदोहन नीतियाँ
डॉ.नरेन्द्र कुमार आर्य यह लेख "हस्तक्षेप' वेबसाइट के अतिरिक्त "फिलहाल" पत्रिका में भी छप चूका है . http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/issue/2013/07/28/%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%A8-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AF#.UfgYAI1kPSh संसाधन और आदिवासी समुदाय प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता, औद्योगिकरण की प्रबल लालसा, पूँजी की बेतहाशा भूख और समाज के सबसे कम ‘कामनारहित’ जनसमुदायों जिन्हें हम आदिवासी भी कहते हैं, का समीकरण वैश्विक और राष्ट्रीय स्तरों पर बड़ा ही जटिल स्वरुप लेता जा रहा है. इस समीकरण के कारण उत्पन्न परिश्थितियों का सबसे भयावह रूप तीसरी दुनिया के देशों में परिलक्षित हो रहा है, विशेषकर अफ्रीका,एशिया और लैटिन अमेरिका के कुछ सबसे कम आय वाले देशों में. यह बड़ी ही विडंबनात्मक बात है कि प्राकृतिक संसाधनों का सबसे बाद ज़खीरा उन्ही इलाकों में सबसे ज्यादा संतृप्...