संसाधनों का सामुदायिक अधिकार बनाम राज्य की निरंकुश विदोहन नीतियाँ

डॉ.नरेन्द्र कुमार आर्य
 

 

यह लेख "हस्तक्षेप' वेबसाइट के अतिरिक्त  "फिलहाल" पत्रिका में भी छप चूका है .
 
संसाधन और आदिवासी समुदाय
       प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता, औद्योगिकरण की प्रबल लालसा, पूँजी की बेतहाशा भूख और समाज के सबसे कम ‘कामनारहित’ जनसमुदायों जिन्हें हम आदिवासी भी कहते हैं, का समीकरण वैश्विक और राष्ट्रीय स्तरों पर बड़ा ही जटिल स्वरुप लेता जा रहा है. इस समीकरण के कारण उत्पन्न परिश्थितियों का सबसे भयावह रूप तीसरी दुनिया के देशों में परिलक्षित हो रहा है, विशेषकर अफ्रीका,एशिया और लैटिन अमेरिका के कुछ सबसे कम आय वाले देशों में. यह बड़ी ही विडंबनात्मक बात है कि प्राकृतिक संसाधनों का सबसे बाद ज़खीरा उन्ही इलाकों में सबसे ज्यादा संतृप्त रूप में मौजूद है जहाँ ‘नागरिक सभ्यता’ से दूर रहना पसंद करने वाले लोग सबसे ज्यादा हैं. भारत के सन्दर्भ में ये बात बहुत ही स्पष्ट रूप से दृष्टव्य है-झारखण्ड,उड़ीसा,छत्तीसगढ़,मद्यप्रदेश इत्यादि इलाके आदिवासी अधिवास और संसाधनों दोनों के मामले में धनी हैं. इसी तरह लैटिन अमेरिकी देश कोलंबिया में भी अफ़्रीकी-कोलंबियाई समुदाय जहाँ पर निवास करते है वहीँ पर कई खनिज पदार्थों का संकेन्द्रण पाया जाता है. कोलंबिया में२००२ से २०१० के बीच देशी और विदेशी कंपनियों को प्राकृतिक संसाधनों के विदोहन के लिए ७५०० आज्ञापत्र जारी किये गए.
लालच, भ्रष्टाचार, पूँजी के प्रजनन का अदम्य आवेग और शक्तिहीन लोगों के शोषण की आसान संभावनाएं प्राकृतिक संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार को दरकिनार कर लूट-पाट की रमण स्थली बना डालते हैं.लन्दन स्थित माइनॉरिटी राइट्स ग्रुप्स की २०१२ की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों के खनन के कारण ३७० मिलियन ‘आदिवासी’  समुदायों(इनमे से ७५% एशिया में ही रहते हैं) के अपनी भूमि से उजड़ने और संसाधनों से बेदख़ल किये जाने की प्रबल संभावनाएं हैं.
संसाधनों के लूट की वैश्विक मुहिम
कोलंबिया में ही आर्गोस नाम की सीमेंट बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी ने ३१.३ हज़ार एकड़ भूमि को खाली कराने के लिए पैरा –मिलिट्री तत्वों के सहयोग से जबरदस्ती हजारों परिवारों को उजाड़ दिया.इसी तरह मध्य अमेरिकी देश पनामा में १७ मिलीयन तांबे के भंडार के उत्खनन के लिए १२५०० एकड़ भूमि का अधिग्रहण करने के लिए गाबे बुगल आदिवासियों को ज़बरदस्ती उनकी जमीन से बेदखल कर दिया गया. पेरू में दसंबर २०११ में तांबे के ही उत्खनन के विरोध में इतने प्रबल आन्दोलन हुए की सरकार को आपातकाल घोषित करना पड़ा. ऑक्सफेम नामक अन्तराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन की एक रिपोर्ट का आकलन है कि २००१ से विकासशील देशों में २२७ मिलियन हेक्टेयर ज़मीन को या तो अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों को बेच दिया गया है या लीज़ पर दिया गया है जो पश्चिमी योरोप के कुल क्षेत्रफल से भी ज्यादा है. दुनिया के ३२ देशों में ही इसका ९० फ़ीसदी हिस्सा है जिसमे लैटिन अमेरिका के १६ देश और अफ्रीका ८ देश एवं अन्य ८ एशिया के हैं.
अर्जेंटीना,ब्राज़ील कोलंबिया,वियतनाम,गैम्बिया, नाईजेरिया इत्यादि के प्राकृतिक रूप से समृद्ध इलाकों पर सबसे ज्यादा गिद्ध दृष्टि है. वियतनाम के ९०,००० जातीय थाई लोगों को सोन-ला जलविद्युत संयंत्र के करण अपनी ज़मीन से बेदखल होना पड़ा ताकि कि औद्योगिकरण की प्रक्रिया को तेज़ी से चलने दिया जाए. न तो इन ९०,००० जातीय थाई के पास खेती के लिए कोई ज़मीन बची है नहीं विकास के लिए उत्तेजित सरकार ने उन्हें कोई रोज़गार मुहैया कराया है, अन्य मुद्दे तो कहीं हैं ही नहीं. इसी तरह अमृता पटवर्धन का मानना है कि डैम बनाने की भारत सरकार की मुहिम ने (अब तक ३,५०० डैम (बांध) बन चुके हैं) २ से ५ करोड़ लोगों को बेघर और बेरोज़गार कर दिया है जिसमे से सबसे अच्छे आंकड़े भी सिर्फ २५ फ़ीसदी लोगों के पुनर्वास की बात कहते हैं जिसका मतलब हुआ १.५ से ४ करोड़ लोग अभी भी बिना किसी सरकारी सहयोग के सरकारी निरंकुशता और विकास की बलिवेदी पर भेंट चढ़ाये जा चुके है. इनमे ४०% अनुसूचित जनजाति व २०% अनुसूचित जाति के लोग आते है. इसी तरह भारत में विकास कार्यकर्मों (डैम, खनन,विशेष आर्थिक क्षेत्र, औद्योगिक सयंत्र इत्यादि ) के कारण विस्थापित आदिवासी समुदायों का प्रतिशत ४० से भी अधिक रहा है जबकि भारत की कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ ८% है. इसका मतलब है आदिवासी, अन्य समूहों या अगड़ी जातियों के मुकाबले ५००% अधिक तक, इन योजनाओं के शिकार हुए हैं व् हो रहे हैं. वन संरक्षण अधिनियम, राष्ट्रीय पर्यावरण नीति , और वन अधिकार अधिनियम के कागज़ पर मौजूद होने के वावजूद न तो वन सुरक्षित रह पाते हैं न वहां रहने वाले लोगों के मानवाधिकार.
भारत में खनन- भ्रष्टाचार
संतोष हेगड़े की बेलारी (कर्नाटक) में लौह अयस्क के खनन पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ २००६-२०१० के दौरान ही निर्यात से सरकार को १६,५०० करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ है. इस लूट/गोरखधंधे में ताक़तवर राजनीतिज्ञ, स्थानीय संचालक, सरकारी क्षेत्र की कंपनी राष्ट्रीय खनिज विकास निगम और निज़ी क्षेत्र की चार बड़ी कम्पनियाँ जे.एस.डब्लू(जिंदल ग्रुप), अदानी इंटरप्राइजेज,ऍम.एस.पी.एल. लिमिटेड.सेसा गोवा (वेदांता ग्रुप) के शामिल होने के सबूत हैं. यहाँ हम कोयले जैसे उत्खनन उद्योग से जुड़े अवैध तस्करी और लूट-पाट  की बात नहीं कर रहें हैं जो पिछले ५०-६० वर्षों से माफिया के द्वारा संचालित किया जा रहा और जिसका क्षेत्रफल ५० से भी ज्यादा जिलों में फैला हैऔर अंदाजा है ये करीब दो से पांच लाख करोड़ के बराबर हो सकता है . इसी तरह शाह आयोग की लौह उत्खनन पर रिपोर्ट ने गोवा में ३५,००० करोड़ रूपये की लूट की बात कही है इसमें में भी माफिया, राजनीतिज्ञ, नौकरशाहों पर आरोप लगाये गए हैं. सिहोरा और जबलपुर (मध्यप्रदेश) में कर्रीब ५,००० करोड़ की लूट के गयी है.सिर्फ भारत में पिछले साल अवैध उत्खनन के ८२,००० मामले दर्ज कराये गए हैं मगर इसमें लिप्त अपराधियों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है.
  इन सौदों के माद्यम से देश अर्थात अंततः नागरिकों के संसाधनों पर सामूहिक अधिकारों की उपेक्षा करके उनको निजी मुनाफाखोरो और इजारेदारों को सौंप दिया जा रहा है. ये सिर्फ संसाधनों के आर्थिक विदोहन का ही मुद्दा नहीं है यह जनता के मूलभूत  मानवाधिकारों,सांस्कृतिक अधिकारों और अस्मितायी पहचानों के संरक्षण का प्रश्न भी है.विकास की वासना, औद्योगिकरण की उत्कट लिप्सा, और पूँजीवाद की प्रबल बीमारियों ने न सिर्फ बहुराष्ट्रीय या राष्ट्रीय कंपनियों और उनके संचालकों को जकड़ रखा है बल्कि राज्य की मशीनरी अपने वर्गीय चरित्र के कारण खुद एक एक प्रकार से इन मुनाफाखोर और शोषक निगमों और कंपनियों की दलालगिरी की प्रक्रिया में लिप्त हो गयी प्रतीत होती है.
   
   
पूरे विश्व पर नज़र डालें तो कुछ सामान्य प्रवृतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं जैसे आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण, भूमंडलीकरण, नगरीकरण, औद्योगीकरण, जनसँख्या में उत्तरोतर वृद्धि व् संबध प्रक्रियाएं. ये ‘सभ्यता’ के विकास के स्थापित प्रतिमान हैं मगर इन सभी की मांग समान है  और आगामी प्रक्रियाएं समान्तर रूप से चल रही हैं -ज्यादा से ज्यादा अ-वनीकरण, बढ़ती आबादी के लिए कृषि भूमि का विकास,  शहरों के लिए सीमेंट और खनिज पदार्थों का उत्खनन , जीवन-पद्धति में आये बदलावों के लिए उर्जा के संसाधनों का अधिक से अधिक विदोहन, खाद्य-उद्योगों के लिए उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण. हमारे ही देश में लौह खनिजों की मांग २०१५ तक ८०% बढ़ जाने की संभावना है. वर्तमान में ७ अरब से बढ़कर २०५० में वैश्विक जनसंख्या ९ अरब हो जाने की सम्भावना है.मगर ये इतना सीधा–सादा समीकरण नहीं है. प्राकृतिक संसाधनों के उपभोग को पूँजीवाद की ताकते निर्धारित करती हैं.अमेरिका में दुनिया के सिर्फ दो % लोग रहते हैं मगर उनके पास २५% कारें हैं और संसार की १/४ उर्जा भी अकेले वही खर्च करते हैं क्योंकि अमेरिका सबसे बड़ी पूंजीवादी शक्ति है, उसके पास सबसे ज्यादा धन और विदेशी मुद्रा है.विश्व की लगभग आधी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अमेरिकी ही हैं. यानि संसाधनों का वैश्विक वितरण प्राय: विकासशील देशों के पक्ष में रहा है किन्तु उनके उपभोग पर अधिकार या नियंत्रण प्राय: धनी देशों का ही रहा है. इसी तथ्य के इर्द-गिर्द अमीर समीन और आंद्रे फ्रैंक ने आर्थिक केंद्र (धनी देश) और परिधि(गरीब किन्तु संसाधन-संपन देश) की अवधारण प्रस्तुत की थी .  इसका सीधा सा मतलब ये है समकालीन सोच और सरकारों के व्यवहार के अनुरूप दबाब सबसे ज्यादा कमज़ोर समुदायों पर ही रहेगा और अभिजन तथा सामान्य नागरिकों के बीच टकराव की परिस्थितयां अधिक जटिल और प्रबल होंगी
सरकारों का असंवैधानिक रवैया व नागरिक अधिकारों का हनन
       सरकार की नजर में इस देश के सबसे महत्त्वपूर्ण अभिलेख संविधान का वजूद और उसके द्वारा तय वरीयताएँ इस मशीनरी के वर्गीय चरित्र और स्वहित साधने की संकीर्ण मनोवृत्ति के चलते पूरी तरह से धूमिल,ध्वस्त और दरकिनार कर दी गयी. हैं. नवउदारवाद के दौर के राज्य अपनी नीतियों की संकीर्णता, कार्य-पद्धति, और उद्देश्यों में किसी निजी निगम की तरह होते जा रहे है. बहुत सारे देशों में भारत के साथ-साथ, सरकार के सर्वोच्च पदों पर आसीन मंत्रियों के इन पूंजीवादी तत्वों के साथ सत्ता के दुरूपयोग , भ्रष्टाचार ,रिश्वतखोरी और कमीशनखोरी पर आधारित सम्बन्ध रहे जिसकी एवज में राज्य की संप्रभुता का अवैध प्रयोग करते हुए एक तरफ तो इन पूंजीवादी शक्तियों को शोषण का अधिकार दे दिया जाता है वहीँ सामान्य नागरिकों के हिस्से में सिर्फ ग़रीबी, भूखमरी, विस्थापन, लाठियां, गोलियां और नक्सलवादी या देशद्रोही होने की संज्ञायें ही हाथ आती हैं. यहाँ तक की सेना जैसे ‘राष्ट्रवादी’ संस्था के उच्च-पदस्थ नौकरशाह भी सैनिक साजो-सामान की बिक्री में रिश्वतखोरों और कमीशनखोरी से परहेज़ करना ग़लत या अनैतिक नहीं समझ रहे हैं. ये एक वर्गीय सोच से जकड़े होने के लक्षण हैं . ये वो वर्ग है जिसके के लिए इस देश के ७०-७५ फ़ीसदी जनता का कोई वजूद नहीं है. अपने कनेक्शन,पहुँच और पैसे के ज़रिये ये कभी भी किसी भी देश पलायन करने के लिए तैयार और लालायित रहते है. ये पॉवर और पैसे  पर फलने –फूलने वाला परजीवी वर्ग है. देश के संसाधन, जनता और संप्रभुता उसके के लिए खाद्य-पदार्थ और उर्जा के स्रोत हैं और उसकी मानसिकता और कोशिश किसी भी कीमत पर इन पर नियंत्रण और प्रभुत्व बनाये रखने की होती है. इनके इन ‘कुकर्मों’ और ‘कुत्सित सोच’ का खुलासा मुख्यधारा के मीडिया द्वारा कभी कभी ही सार्वजानिक रूप से बाहर आ पाता है  जो किसी जलमग्न हिमशैल (ग्लेशियर) का सतह पर ‘दृष्टव्य’ हिस्सा भर है सच्चाई का ९० फ़ीसदी हिस्सा तो ओझल ही रहता है.
सरकारों का उच्चवर्गीय चरित्र और बहुसंख्यक तबके को अशक्त बनाये रखने का षडयंत्र  
 भारत का संविधान एक एक लोकतान्त्रिक,समाजवादी और समतामूलक राज्य की बात कहता है मगर हालिया सरकारों के काम करने के तरीकों, नीतियों के स्वरुप और क्रियान्वयन सिद्ध करता है कि इनका के सबसे बड़े ‘खरीदार’ और ‘मुनाफे’ में रहने वाले लोग कोर्पोरेट घराने और वर्ग,नौकरशाह,माफ़िया, सरकार के पालतू ठेकेदार और राजनेता(संसद में अधिकांश सांसद करोड़पति और उनकी सम्पति की विकास वृधिदर ४००-५००% तक रही है)  ही रहे हैं व इनकी छत्रछाया में पलने वाला उच्च-माध्यम वर्ग. देश की अधिकांश आबादी को अपना जीवन अपनी प्राकृतिक सहजवृति और नैसर्गिक सर्वाइवल इंस्टिंक्ट के भरोसे ही गुजारना होता है. सरकार सिर्फ लोक-कल्याणकारी नीतियों के काग़जी और आंकड़ाई शेर तैया करने में यकीन करती है. वास्तव में न तो जनता अर्थात सामान्य नागरिकों के बहुसंख्यक हिस्से के लाभ,विकास , उन्नयन और सशक्तिकरण  के लिए नीतियां बनाये जाने का ऐच्छिक दृण-संकल्प है न सोच. अगर वास्तव में ऐसी सोच नहीं होती तो राज्य का वर्गीय प्रभुत्व आज़ादी के इतने दशकों बाद वैसा ही नहीं बना रहता , इस बात की ज्यादा संभावना है कि वो समाप्त न सही विखंडित और कमज़ोर हो कर लोकतानंत्रिकीकरण की और अग्रसर हो चुका होता. मगर राजनीति में ये अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होता. कोई भी सत्तासीन ,प्रभुत्वशाली और नियंत्रक वर्ग अपने ही हितों की बेहतरी के लिए ही सत्ता और राज्य की शक्तियों का प्रयोग करता है. भूमंडलीकरण के दौर में उसे अपने ही प्रकार के वर्गों से विदेशों से सहयोग प्राप्त हो रहा है. वैचारिक स्तर पर नवउदारवाद और पूँजी के भूमंडलीकरण ने अधिकांश विश्व की राजनैतिक शक्तियों को प्रभावित,अभिभूत अथवा नियंत्रित कर रखा है. सत्ता अभिजन को इसके परोक्ष और प्रत्यक्ष भौतिक फायदे हासिल होते हैं और बदले में वो यही फायदे इन बाहरी त
त्वों को मुहैया करवाते है. इसी समीकरण का एक नमूना है स्विट्ज़रलैंड और कैरेबियाई द्वीपों में स्थित काले धन के स्वार्गिक स्थलों में जमा उपरोक्त तत्वों की अवैध और भ्रष्ट आचरण से कमाया गया धन. ये धन नागरिकों की सम्पति का गबन और चोरी है, उनका हिस्सा है जिसे सत्ताधीशों, पूंजीपतियों,माफिया और नौकरशाहों  ने ‘अदृश्य’ तरीक़े से तस्करी कर उपरोक्त बैंकों में जमा कर रखा है. रोमांचक बात ये है कि वैश्विक स्तर पर काले धन के ज़खीरे में भारतीयों का योगदान बाकि के दस अन्य सबसे भ्रष्ट देशों हमपेशा लोगों के योगदान से भी ज्यादा है.
सरकारों का अवैध राजनीतिक व्यवहार     
यहाँ राज्य और नागरिकों के अधिकारों के बीच में भयंकर खाई दिखाई पड़ती है.राज्य और उसका सबसे महत्वपूर्ण उपकरण – सरकार, ये मान कर चलती है कि राष्ट्र की राजनीतिक और भौगोलिक सीमा के अन्दर उसकी शक्ति नागरिकों और अन्य संसाधनों के ऊपर असीमित और अमर्यादित है. नतीजन ऐसे राष्ट्र जहाँ लोकतंत्र अभी भी जातीयता, जातिवाद,नस्लवाद, भाई-भतीजावाद ,सामंतवाद जैसे गैर-समतामूलक तत्वों से ज्यदा संचालित होता है बजाय सेकुलर और तटस्थ समोजोपोयोगी संवैधानिक निर्देशों और मर्यादाओं के वहां पर सरकार की शक्तियों के जन-विरोधी तेवर और आचरण का पाया जाना बहुत ही प्राकृतिक और सामान्य लक्षण है. इसी विकृति व मानसिक बीमारी के कारण वहा इस तथ्य को नज़रंदाज़ करने लगती है कि राज्य और सरकार का अस्तित्व सभी नागरिकों की समान ‘भलाई’ में उत्तरोतर वृद्धि के एकमात्र  और अनिवार्य उद्देश्य के लिए है; उससे कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं हो सकता. सरकार अल्पवर्गीय अभिजन हितों और व्याभिचारी आवेगों के स्वरत-संवर्धन का शोषणकारी यन्त्र बनकर बहुत दिनों तक अस्तित्व में नहीं रह सकता है. उसकी वैधानिकता और ताकत वहीँ तक है जब तक की वो सामान्य नागरिकों के हितों के प्रति जबाबदेह है.
       सामाजिक लोकतंत्र और न्याय के त्रिआयामी (राजनितिक,आर्थिक और सामाजिक) संकल्पना की स्थापना करने वाले संविधान के तले ग़रीबी और अरबपति दोनों विडम्बनात्मक रूप से असाधारण प्रगति कर रहे है.  लोकतान्त्रिक मूल्यों और आदर्शों का ये ये खुले आम मखौल उड़ाया जाना है और उस पर से तुर्रा ये कि ये सब कुछ लोकतंत्र को मज़बूत करने के नाम पर ही होता है. ये दर्शाता है कि लोकतंत्र का दावा करना लोकतंत्र को लागू करने से कहीं आसान है और दुनिया भर के सत्ताधीशों को इस खेल में महारत हासिल है. प्रश्न ये है कि नागरिकों का आचरण क्या होगा ? क्या वो खोखले दावों से संतुष्ट हो जायेंगे या उन्होंने भी लगाम लगाने की योजना बना रखी है? वो लोग, संस्थाएं और तंत्र जो अभिजनीय सरकार के पिट्ठू हैं, वही लोकतंत्र में आस्था रखने वाला व् राष्ट्रवादी कहलाता है; मगर लोकतंत्र की रीड ‘लोक’ विद्रोही, अलगाववादी, नक्सली,देश को कमज़ोर करने वाली ताकतें,असामाजिक तत्व जैसी उपमाओं की सामान्य शब्दावली का शिकार होने के लिए अभिशप्त है. मगर प्रश्न यह उठता है कि दस-बीस-पचास या हज़ार लोग ऐसे नहीं हैं बल्कि पूरे के पूरे समुदाय और समूह इन उपमाओं की परिधि में आते है जिनकी संख्या करोड़ों में होगी ? प्रभुत्वशाली वर्ग और मीडिया जिन शब्दों का प्रयोग इन करोड़ों लोगों के लिए करता है उनकी लोकतान्त्रिक समझ और विचारधारा खुद उन्हें संदेहास्पद और वास्तव में हास्यास्पद बना देती है.
ये जानते हुए भी की सरकार की संगठनात्मक और सैन्य-शक्ति के समक्ष पहले से ही संसाधनविहीन, गरीब और निरीह समुदायों का उग्र या अहिंसक विरोध और मात्र जीवट कही नहीं ठहरेगा, वो ऐसे कदम उठाने के लिए विवश होते हैं अपनी जान को जोखिम में डालकर तो ये स्वत सिद्ध करता है शोषण, दमन, अमानवीयकरण, और अस्मिताओं के उन्मूलन से जूझते समुदायों के पास कोई दूसरा उपाय नहीं बचाता है जिससे वो अपनी आवाज़ को नागरिक सभ्यता के मेट्रोपोलिस केन्द्रों तक पहुंचा सकें. विवशता विद्रोह की फैक्ट्री बनती जा रही है और सरकारी मशीनरी उसका अपराधीकरण करती जा रही है. सरकारी तंत्र की अतिरंजित अवैधानिक, असंवैधानिक और अनैतिक कारगुजारियों के खिलाफ उठाया गया कोई भी कदम जल्द ही ‘आपराधिक’ लेबल का शिकार बनने को निमंत्रण देता है.
       विश्व के नागरिकों के समक्ष ये बहुत बड़ी चुनौती है कि एक तरफ तो उन्हें अपने आप को लालची और सिर्फ मुनाफे के लिए संचालित व्यावसायिक उपक्रमों के कुत्सित उद्देश्यों के प्रति जागरूक और संगठित होकर संघर्ष करना है वहीँ उन्हें अपने ही भ्रष्ट सरकारी तंत्र और संस्थाओं को विकृत होने से बचाना और उन पर लगाम लगाना  है.

संक्षिप्त परिचय :
युवा लेखक,कवि एवं स्वतंत्र शोधकर्ता है. राष्ट्रीय एवम अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं,शोध जर्नल्स और प्रतिष्ठित वेबसाइट पर अंग्रेजी व् हिंदी में लेख/कविता प्रकाशित.



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