अदृश्य




अदृश्य 

रिश्तों का रस्सी न होना,
अदृश्य होना,
होना-सा भी न होना—
होता है।

दिखने की ज़िद नहीं होते रिश्ते,
सिर्फ़ हलफ़नामे करते हैं ऐसा,
करारनामे करते हैं—
संशय को मुहरबंद करके।

वे पढ़ सकते हैं,
वे अनपढ़ होते हैं
आत्माओं के बोझ का एल्जब्रा।

वे पकड़ सकते हैं
मुट्ठियों की रेत में
महाद्वीपों की दूरियाँ,
और टूट जाते हैं अहसासों के
एक ग्राम वज़न से…

…जुड़ने के लिए
कभी आँसुओं से,
कभी एक प्यार-भरी नज़र से,
या शरीर की आँच से—
बिना पिघले।

न कोई गिरह,
न कोई गाँठ,
बस एक अदृश्य आकाश-सा विश्वास।

— नरेन्द्र हसन काशवी

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